Thursday, 15 October 2015

सफेद - कुत्ते

सफेद - कुत्ते (कविता )

कभी हुए अमन - चमन के ,
तो कभी करवाएं मनुष्य के टुकड़े ,
फिर भी इनकी भूख न मिटी जाने कैसे है ये भूखङे ??
जात - भात समझ मे आती हैं , जानवरो की
पर इनकी परख वश में नही मानवरो की,
कल देखा सुअर को मैंने खाते
बङे गुमान से उसको लजाते,
तो आई याद मेरे सफेद - कुत्ते की
वो खाते कम, क्यों
ज्यादा थाली है बजाते ?
खाओ - खाओ खूब खाओ परंतु धरम की आंच पर राजनीति की दाल ना पकाओ,
मानो "रनवीरा" की बात और सुअरों से सीख जाओ,
बस अब बहुत हुआ
खान - पान की राजनीतिक दुकान को गिराओ ।।

Wednesday, 7 October 2015

बस यहाँ इंसान रहते हैं

बस यहाँ इंसान रहते हैं  (कविता )

ओ ! मगरूर इंसानो
अरे धर्म के परवानो
इंसान को ना मारो ,
मजहब से करते हो बैर
तो जिहाद का लगाओ खैर
अब मासूम लोगो को करो ना ढेर ,
दिखावे के लिए कब तक चलेगा खूनी - खेल
रथ हो या तजिया का धर्म रेल
मन्नत हो या हो प्रार्थना सबका है एक मेल
क्योंकि मंदिर हो या मस्जिद
कहीं अल्लाह या भगवान नही बसते है
हम ही बनाते है सारे कोठे - अटारी
और हर जगह पर यहाँ इंसान रहते है ।।

Friday, 2 October 2015

बापू का निर्मल गाँव

 बापू का निर्मल गाँव 


गाँधी उस गाँव का नाम 
जहाँ बसता था तन लुभाता सूरज 
जहाँ रहती थी मन चुराती शाम ,
जहाँ बहती थी  बस ताज़ी हवाएँ 
और रहते थे लोग सद्कर्मों में में मन बसाये ,
जहाँ धरती थी चुनर में सजती 
जहाँ गंगा में पावनता थी झलकती ,
जहाँ बदन -सी कोमल थी माटी 
जहाँ चिड़ियाँ की थी राग बजाती ,

और थी जन्नत- सी हर काम
गाँधी  हैं उस नव - सदसोंच का नाम,

अब हमे भी वहीं करना हैं 
इस विनाशी काल से लड़ना हैं 
पेड़ो से धरा को भरना हैं 
कचरों को अब दूर करना हैं 
अकेले नहीं सबको साथ ले चलना है 
एक नये पर्यावरण का राह गढ़ना हैं 
बस वीरों के राह में हमको ढलना हैं 
और गर्व से बस यही कहना हैं
ये हैं गाँधी सोंच का परिणाम
यह हैं मेरे "बापू का निर्मल गाँव " । । 

Wednesday, 30 September 2015

गुहार क्यूँ ?

 गुहार क्यूँ ?

प्यार के दुश्मनों से गुहार क्यूँ 
अनसुनो के दर पर पुकार क्यूँ ?

शान्ति - समझौते वो बस एक नाटक 
समझता हैं बस खुद को वो घातक 

करता हैं खिलवाड़ हर वक़्त मानवता से 
और देता हैं सुविचार वो दानवता पे 

वीणा की वाणी की उसको न परख हैं 
बिन मंज़िल की पगडण्डी वो सड़क हैं 

उसको तो भाषा बस हिंसा की आती 
मानव वेश में वो हैं दानव जाति 

भरत - राम का रिश्ता ना जाने 
गाँधी - ज़िन्ना के वो वो बोल ना माने 

इंसान को इन्सानियत जो हैं बचानी 
स्वर्ग - सी धरा अगर हैं सजानी 

तो प्यार के दुश्मनों से गुहार क्यूँ 
अनसुनो के दर पर पुकार क्यूँ ?

समझ जा रे! सौदागर इंसान (कविता )

समझ जा रे! सौदागर इंसान 

कहीं नीला, कहीं काला तो कभी कहरीला
मुहँ फाङे मातम ले आए
जो था कभी सावन का साज सुरीला
मर रहा कोई  सूखा - सूखा
टूट रहा कोई  झूका - झूका
जल रहा है कोई तपन से
तो कोई बिना अग्न के,
अब आङ में किसके जाए जहान
विनाश कर के समझे सब खुद को महान
दे रहे चेता धरा - तरू और आसमान
समझ जा रे ! सौदागर इंसान ।।

Saturday, 26 September 2015

एक गुड़िया बड़ी प्यारी[कविता ]

एक गुड़िया बड़ी प्यारी[कविता ]

एक गुड़िया बड़ी प्यारी - बड़ी न्यारी
सब उसकी करते प्यार से खातिरदारी
बड़ी होकर चल पड़ी बन के नेत - नारी
पर पता नहीं था होती हैं क्या दुनियादारी ?

चल पड़ी बेख़ौफ़ अपने चमन में
दो - चार पग चलकर खुश थी अमन में
बैठ गई बेफिकर अपने पीपल के छाँव में
अचानक गड गए शूल उसके पाँव में ,

लहुलहान  हो जब खोली वह अपनी पलकें
झपकती  नज़रों से देखी ऐसी झलके
वह पीपल का पेड़ अपना था
जिसने उसको खुद में जकड़ा था
लूटेरा भौंरा था वहीं , जो उसका सपना था ,

बस हो - हल्ला में छिप गई वो बेचारी
छोड़ चली झूठी चमन की भरी क्यारी
और लोग आहें भर कहते रहे
एक गुड़िया थी बड़ी प्यारी - बड़ी न्यारी ।।


ना माली की , ना डाली की [कविता ]

बन कर के हम फूल महकते - महकाते
अपनी खूबसूरती से दमकते - दमकाते 
जहाँ भी हम जाते बेरंगों  में रंग भर आते 
तारों - सा धरा को हम हैं सजाते ,

शादी या शोक सभा सबको हमने खुद से सजाया 
खिल के या गिर के बस खुशबु फैलाया 
हर गीत - सा लोगों ने मन में बसाया 
मैं तो खिलती रही ,चाहे धूप हो या छाया ,

पर मैं तो ना रही माली की ना डाली की 
और ना ही रही शोभा ,श्रद्धा के थाली की 
नारी - सा ही मुझको भी ,कभी घूँघट में कभी पैरों तले दबाया 
आज भी वैसी ही हूँ , चाहे राम मिले या दुश्शाया ।। 

Tuesday, 22 September 2015

तो किस शरण में हो फरियाद?{कविता }


मंदिर जाऊँ या मस्जिद 
या करूँ ना तुझको याद ,
तेरे घर ही अब जल रहे है 
तो किस शरण में हो फरियाद?

टुकङे - टुकङे हो गए है 
तेरे ओढाए तन के लिबास, 
खुद ही खङे हो उधङ बदन 
तो कौन बचाए हमारी लाज?

हो रहा व्यापार तेरा 
ढोंगी बेचे बैठ के बिंदास, 
तेरी किमत तो यूं लग गई 
तो न्याय की किससे रखे हम आस?


धमाको से तो जगा नही 
कुकर्मी को भी सजा नही 
तू भी अंधा हो गया है रे "रनवीरा " 
पत्थर से मांगने चला है साँस ।।

Monday, 21 September 2015

और लोग कहते हैं की .....

इस देश में नदीयों में नदीयाँ रहती है
फिर भी फसल प्यासे  मरती है
नाली - नाले भरे मिलते है कचरों उससे
और लोग कहते है यही तो गंगा बहती है,

नारी पर अत्याचार करे
फिर भी नारी को जननी कहे
अरेसरेआम यहाँ होलिका जलती है
और लोग कहते है यही दुर्गा की धरती है,

रामायण - कुरान यहाँ पर है पूजे जाते
और
 धर्म के नाम पर खूब माल कमाते
अरे ! यहाँ धर्म के नाम पर लाशे ढहती है
और लोग कहते है कि यह बुध्द की बस्ती है,

बकरो की बली चढाते
गायों की हत्या करवाते
अरेयहाँ फरिश्ते भी स्वाद चखती है
और लोग कहते है कि यह शेरों की शक्ति है ।।

Monday, 14 September 2015

हिंदी हिंसा का किस्सा [कविता ]


कबीर - भारतेंदु - प्रेमचंद की करते हैं पूजा
और पालक झपकते बनाते हैं हिंदी को दूजा ,

बस गिने - चुने लोगों में ही अब इसका नाम हैं
हिंदी हैं हिंदुस्तानी बस यह एक नाम हैं ,

हिंदी हमारी हैं प्यारी , और हैं माथे की बिंदी
पर हिंदी - दिवस में ही केवल बनती हैं लबों की गिनती ,

अपने ही घर में भई ! पढने को हिंदी करे गुहार
अब तो बस पन्नों में ही बस हैं सभ्य - संस्कार ,

पर अब भी भारत - वीरों में , बसी हैं हिंदी की स्याही
जब तक ना मिलेगी हिंदी को हंसी , यूँ ही चलेगी ये लड़ाई ,

कलम - शब्द फिर मिलेंगे , बनेगी फिर हिंदी हर तन का हिस्सा
साँसे - स्याही से लड़ेंगे , चाहे कितना भी बने हिंदी - हिंसा का किस्सा । । 

Saturday, 5 September 2015

गुरु गुण की गाथा ---------------- तुम ही तो हो ब्रह्माण्ड के रचनाकार हो तुम ही आदर्श जीवन के सदविचार हैं गुरु करम को , शत - शत नमन नमस्कार ।।


गुरु तुम सारे गुण में हो
अन्नत से लेकर , शून्य में हो
तुम ही तो हो एक सच्चा धर्म
और हर पुण्य के कर्म में हो
गुरु तुम सारे गुण में हो ,

काले स्लेट पर ऊजला ज्ञान
कोरे मन में प्रज्वलित ध्यान
लटपटाती लबों को अचूक कमान
बिखरे शब्दों को अर्थकारी पहचान
ना होते तुम तो रवि रहता अंधयान
और रहती वसुधा बस बंजरबान ,

तुम हो तो यह " रणवीरा " हैं
और बनी हैं कविता सुरवान
तुम हो महान से भी महान
तुम ही तो हो ब्रह्माण्ड के रचनाकार
हो तुम ही आदर्श जीवन के सदविचार
हैं गुरु करम को , शत - शत नमन नमस्कार ।। 

Wednesday, 12 August 2015

ऊर्जा कहूँ कि सुर्या (कविता ) ( माननीय भूतपूर्व राष्ट्रपति डाॅ . एपीजे अब्दुल कलाम के लिए समर्पित शब्दो की श्रध्दांजलि )

ऊर्जा कहूँ कि सुर्या (कविता ) 

( माननीय भूतपूर्व राष्ट्रपति डाॅ . एपीजे अब्दुल कलाम के लिए समर्पित शब्दो की श्रध्दांजलि )
वर्तमान का रख कर ध्यान
भविष्य का देते थे ज्ञान
थी लबों पर सरस्वती की बान
हौसले  को देते चले उङान
देश को बना चले  ऊर्जावान
शत् - शत् नमन, है हमारे सुर्यावान
उम्र को दे कर गए मात
अंत तक रहे युवाओं के साथ ,
मिट्टी के बने, मिट्टी के लिये चले
भारत के रत्न, भारत को प्रयत्न दे चले ,
खोया है हमने देश का धङकन
पर भर कर गए है युवा मार्गदर्शन
तिरंगा भी दिया है कराह
गर्व की दे राह , पर दिल मे बसी रहेगी आह ,
भूलेगा ना आपको जहान
महान से भी आप रहोगे महान
ऊर्जा से ज्यादा ऊर्जावान
शत् - शत् नमन , है हमारे सुर्यावान ।।

यह अंतिम विदाई नही ( कविता) यह अंतिम विदाई नहीं देश सपूत की सगाई है बस जिंदा रहो मिसाल बन के इसलिए जन - सैलाब उमङ आई है,

यह अंतिम विदाई नही ( कविता)


यह अंतिम  विदाई नहीं
देश सपूत की सगाई है
बस जिंदा रहो मिसाल बन के
इसलिए जन - सैलाब उमङ आई है,
इन आँखों की नमी पर ना जाओ
इसके जरिए गंगा चलकर छाई है
कर्म को बना देंगे अब धर्म
चमन से यह खबर आई है,
कलाम कलम से लेकर मिसाइल तक
रामेश्वरम से लेकर जन - जन के भलाई तक
आप थे और रहोगे जिंदा मार्गदर्शन बनकर
लहराते तिरंगे  से भी यही खूशबू आई है
यह अंतिम विदाई नही
देश सपूत की सगाई है ।।

Monday, 27 July 2015

ऊर्जा कहूँ कि सुर्या (कविता )


ऊर्जा कहूँ कि सुर्या (कविता ) 

( माननीय भूतपूर्व राष्ट्रपति डाॅ . एपीजे अब्दुल कलाम के लिए समर्पित शब्दो की श्रध्दांजलि )

वर्तमान का रख कर ध्यान
भविष्य का देते थे ज्ञान
थी लबों पर सरस्वती की बान
हौसले  को देते चले उङान
देश को बना चले  ऊर्जावान
शत् - शत् नमन, है हमारे सुर्यावान
उम्र को दे कर गए मात
अंत तक रहे युवाओं के साथ ,
मिट्टी के बने, मिट्टी के लिये चले
भारत के रत्न, भारत को प्रयत्न दे चले ,
खोया है हमने देश का धङकन
पर भर कर गए है युवा मार्गदर्शन
तिरंगा भी दिया है कराह
गर्व की दे राह , पर दिल मे बसी रहेगी आह ,
भूलेगा ना आपको जहान
महान से भी आप रहोगे महान
ऊर्जा से ज्यादा ऊर्जावान
शत् - शत् नमन , है हमारे सुर्यावान ।।


रवि कुमार गुप्ता " रनवीरा "
एम. ए. इन जर्नलिज्म एंड मास्स कम्युनिकेशन ( दितीय वर्ष )
केंद्रीय विवि. ओडिशा

Tuesday, 21 April 2015

माटी करे सवाल {कविता }

माटी करे सवाल {कविता }

लोकतंत्र के रक्षकों से 
माटी करे सवाल 
कहाँ हो तुम अब मैं लूट रही हूँ ?
सुनो अब मैं टूट रही हूँ ?

समाज के भक्षकों से 
माटी करे सवाल 
खा के मेरे अन्न मुझे ही मार रहे हो ?
क्यों सुन के लोरी ऐसे दहाड़ रहे हो ?

पर सुनो , तुम दोनों मेरे ममता के टुकड़े हो 
मैं कल भी माँ थी ,आज भी माँ हूँ 
क्यों दिन के जीत में , मन का रात हार रहे हो। 

Thursday, 19 March 2015

जीत का सिलसिला

जीत का सिलसिला 

धोनी - टीम की धूम - धड़ाम
 रोहित का रन बना अविराम 
रैना - रहाणे बल्ले के विराट 
और धवन की शिखर - सी मात 
शेर-ए - बल्ला हर गेंद पर भारी रहेगा 
जीतेंगे भई ! जीत का सिलसिला जारी रहेगा ,

हैं पीच पर हमारी पूरी पकड़ 
ना टूटेगी गेंदबाजी की लहर 
फिराते - गिराते हम रहेंगे विकेट 
यादगार बनाएंगे इस बार का क्रिकेट 
फिरकी - फर्राटा हर गेंद का भारी रहेगा 
जीतेंगे भई ! जीत का सिलसिला जारी रहेगा। 

Monday, 9 March 2015

जरूरी - साँसे

जरूरी - साँसे 

दिल हैं पूरी तो धड़कन अधूरी 
टूटी हैं सांसे पर हैं जरूरी 
दिखती मंज़िल और लम्बी सी दूरी 
एह्सांसो से जीने की मजबूरी 
वो सावन की नाचती मयूरी 
पर खुद से ही नहीं पूरी 
सूरज हैं पूर्ण पर वसु से दूरी 
मिलता वही जो हैं जरुरी 
बाकि माया - सागर में हैं स्वप्न - तिजोरी 
क्यूंकि दिल हैं पूरी तो धड़कन अधूरी 
टूटी हैं सांसे पर हैं जरूरी।




Thursday, 12 February 2015

सखी !बसंत कहाँ गया ? {कविता }

सखी !बसंत कहाँ गया ? {कविता }

लहराते पीले सरसों के फूल 
लाल पलाश जस खिले फूल 
कण - कण में मस्ती मशगूल 
हंसी - ठिठोली की रसूल 

वो कोयल की मीठी बोली 
वो गुलाल की मस्त होली 
वसुधा की दुल्हन - सी चोली 
सुबह- सा दूल्हा शाम की डोली ,

सखी !अब वो रवानी कहाँ गयी 
वो कोयल दीवानी कहाँ गयी 
वो सरसों सयानी कहाँ गयी 
बता दो प्रिये बसंत की जवानी कहाँ गयी ?

Wednesday, 11 February 2015

जीतना जरूरी था {कविता }


जीतना जरूरी था 

आपका जीतना जरुरी था
उनका हारना जरूरी था
भगोड़े तो टीक गए
कहने वालो का भागना जरूरी था ,

बड़ी हो चुकी थी गन्दगी
काम ना आइ झूठी बन्दगी
दिखावे का फूल हटाना जरूरी था
नए जोश से झाड़ू लगाना जरुरी था ,

लहरों को हो गया था गुमान
यूँ ही भर रही थी तूफ़ान
पर किनारे तक लाना जरूरी था
ऐसे टूटती हैं लहर बताना जरूरी था।  

Sunday, 1 February 2015

नामी - गिरामी {कविता }

नामी - गिरामी {कविता }

केजीरवाल अगर भगोड़ा हैं 
तो किरण भी उसी कढ़ाई की पकोड़ा हैं ,
सोनिया बस नाम की गाँधी हैं  
अन्ना के नाम पर "आप" की चाँदी हैं ,
भाजपा के मोदी हैं 
या बीजेपी मोदी की गोदी हैं !

                      -रवि कुमार गुप्ता 
                      गोपालगंज , बिहार 

टूटता - लोकतंत्र {कविता}

          टूटता - लोकतंत्र 

वादों की ले झूठी तलवार
गरीबो को ना भरमाओ सरकार
पहन के तुम सफ़ेद चोला
लोकतंत्र पर ना करो प्रहार

गली - गली ना बदलो भाषा
ना तुम तोड़ो समाजवाद की आशा
संविधान को ना बनाओ बाजार
लोकतंत्र पर ना करो प्रहार.

Thursday, 29 January 2015

शीशे की मछली

                  शीशे की मछली 

बड़ी खुश थी वो चारदीवारी पाकर
मचलती - छलकती ,कभी ऊपर - कभी नीचे
वो जल में नृत्य करती

क्यूँकि ना फिकर दाने की
ना ही डर मर जाने की

और वो खुश हो भी क्यों ना
बच जो गई थी इंसानो के बीच आकर
बड़ी खुश थी वो चारदीवारी पाकर। 

Tuesday, 27 January 2015

इक परिन्दा उड़ चला

@शब्दों की श्रद्धांजलि,,,,आर  के  लक्ष्मण  के नाम @
इक परिन्दा उड़ चला छोड़ कर अपना जहां
पर जर्रे - जर्रे पर अब तक निशां बाकी हैं
जब तक रहेंगे धरती - आसमां
फरिश्ता बन कर वो दिल में रहेगा
आग भले ही लग जाए चमन में
वो तो एहसास बनकर याद रहेगा