माटी करे सवाल {कविता }
लोकतंत्र के रक्षकों से
माटी करे सवाल
कहाँ हो तुम अब मैं लूट रही हूँ ?
सुनो अब मैं टूट रही हूँ ?
समाज के भक्षकों से
माटी करे सवाल
खा के मेरे अन्न मुझे ही मार रहे हो ?
क्यों सुन के लोरी ऐसे दहाड़ रहे हो ?
पर सुनो , तुम दोनों मेरे ममता के टुकड़े हो
मैं कल भी माँ थी ,आज भी माँ हूँ
क्यों दिन के जीत में , मन का रात हार रहे हो।
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