Tuesday, 21 April 2015

माटी करे सवाल {कविता }

माटी करे सवाल {कविता }

लोकतंत्र के रक्षकों से 
माटी करे सवाल 
कहाँ हो तुम अब मैं लूट रही हूँ ?
सुनो अब मैं टूट रही हूँ ?

समाज के भक्षकों से 
माटी करे सवाल 
खा के मेरे अन्न मुझे ही मार रहे हो ?
क्यों सुन के लोरी ऐसे दहाड़ रहे हो ?

पर सुनो , तुम दोनों मेरे ममता के टुकड़े हो 
मैं कल भी माँ थी ,आज भी माँ हूँ 
क्यों दिन के जीत में , मन का रात हार रहे हो। 

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