यह अंतिम विदाई नही ( कविता) यह अंतिम विदाई नहीं देश सपूत की सगाई है बस जिंदा रहो मिसाल बन के इसलिए जन - सैलाब उमङ आई है,
यह अंतिम विदाई नही ( कविता)
यह अंतिम विदाई नहीं
देश सपूत की सगाई है
बस जिंदा रहो मिसाल बन के
इसलिए जन - सैलाब उमङ आई है,
इन आँखों की नमी पर ना जाओ
इसके जरिए गंगा चलकर छाई है
कर्म को बना देंगे अब धर्म
चमन से यह खबर आई है,
कलाम कलम से लेकर मिसाइल तक
रामेश्वरम से लेकर जन - जन के भलाई तक
आप थे और रहोगे जिंदा मार्गदर्शन बनकर
लहराते तिरंगे से भी यही खूशबू आई है
यह अंतिम विदाई नही
देश सपूत की सगाई है ।।
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