Tuesday, 22 March 2016

मन में अग्न जलाओं (कविता)

खुलती नहीं आँख बिना पलकें उठाएं 
चूङीयाँ भी खनकती नहीं बिना खनकाएं 
खुलती नहीं आँख बिना पलकें उठाएं 
चल उठ कर खुद के भरोसे 
पैरों के साथ रस्ते - रस्ते 
क्योंकि मिलती नहीं मंजिल 
बिना राह में दिन-रात बिताएं 
उङते धूल बस यही दुहरायें 
चला कर राही सपने बसाएं 
ठोकर का भय दिल से भगाएँ 
बने गड्ढे यही बताएं 
दर्द ही दवा का मोल समझाएं 
चला कर राही मन का ललक जलाएं
ठोकर का भय दिल से भगाएँ
चला कर राही मन में अग्न जलाएं. 

जगा जनशक्ति आशाएँ ( कविता)

राह के पत्थरों में हिम्मत नहीं रोकने की 
आजाद राहगीर को रोकने की 
हर युग में नहीं तोड़ेंगे हम पत्थर 
वक्त हैं पत्थरों को खुद हटने की, 
खत्म होने लगेगी खङी सीमाएँ 
मिट जाएंगी मानसिक विडम्बनाएं
हाथ में हाथ डालकर चल साथी 
मुँह मोङ लेंगी सारी बाधाएं, 
कंश कारावास क्या देगा 
हम उसमें भी लगा देंगे 
जन-सभा, जगा जनशक्ति आशाएँ, 
आंदोलन को जारी रखो 
अकेले ही सही 
गतिशील रखो हौंसलो की दिशाएँ. 

जिंदगी यह जिंदगी (कविता)

मांगी है रिहाई मैंने अपने खुदा से 
जिंदगी के बढ़ते पिङा से 
जख्म बन गए हैं ऊंचे ख्वाब 
दर्द में कैद हैं जिंदा अल्फाज़ 
जिसने दी ऊंचाई वह नीचे रह गया 
और आंख ऊपर से ताकता रह गया 
हाथ भी हाथ को छू नहीं पाते 
चलते चलते यह जख्म किसे दिखाते 
वक्त हैं जो कि चलता रहता है
इंसान भी बस संग में ढलता रहता है 
जिंदगी यह जिंदगी 
जिंदा हो कर भी जलती हैं 
मुर्दा बन कर भी जलती हैं. 

जला दो, जला दो मुझे

जला दो, जला दो मुझे 
जला कर बना दो राख मुझे 
पर जरा सोच ए जलाने वाले 
तू बच कर भी क्या कर लिया 
क्या कर लिया बच कर, 
मैं राख बनकर तेरे ही खेतों में मिला 
धुंध बन तेरे ऊपर आसमाँ में उङा 
और तू देखता रहा खङा के खङा