सखी !बसंत कहाँ गया ? {कविता }
लहराते पीले सरसों के फूल
लाल पलाश जस खिले फूल
कण - कण में मस्ती मशगूल
हंसी - ठिठोली की रसूल
वो कोयल की मीठी बोली
वो गुलाल की मस्त होली
वसुधा की दुल्हन - सी चोली
सुबह- सा दूल्हा शाम की डोली ,
सखी !अब वो रवानी कहाँ गयी
वो कोयल दीवानी कहाँ गयी
वो सरसों सयानी कहाँ गयी
बता दो प्रिये बसंत की जवानी कहाँ गयी ?