Monday, 7 March 2016

तानाशाही का दौर चल रहा हैं ( कविता)

हर घर में शोर चल रहा हैं 
लोकतंत्र में तानाशाही का दौर चल रहा हैं 
खुद की खबर है ही नहीं 
की हम, हम हैं कि नहीं, 
देश तो द्वेष में गुम हैं 
हर बात में धुंध हैं, 
बोले बोल में धर्मनिरपेक्षता 
और जात - धर्म को हैं बेचता, 
सीमाओं पर वीर गोली से हो शहीद 
नेता देशभक्ति के बोल से बने प्रसिद्ध, 
और हर घर में शोर चल रहा हैं 
लोकतंत्र में तानाशाही का दौर चल रहा हैं. 

रंगीन निशान हैं अब मोहब्बत के ऊपर (कविता)

रंगीन दुनिया में बिकती मोहब्बत के नाम पर 
रंगीन गुङिया रंगीन फूल 
वो फूल जो महक से परे हैं 
वो गुङिया जो चहक से परे हैं 
पर मोहब्बत के नाम पर, मोहब्बत के नाम हैं सिर्फ़ 
वरना मोहब्बत को जताने की क्या जरूरत 
दिल से प्यार दिखाने की क्या जरूरत  
क्योंकि मोहब्बत कोई जरूरत नहीं हैं 
और जो जरूरत है वो मोहब्बत नहीं, 
यह मोहब्बत नहीं जो तब्दील हैं रंगीन लिबासो में 
बस फरेब है नशीली साँसों में , पत्थरीली आँखों में 
मोहब्बत तो मिलती ही झोपड़ी के रातों में 
सब थोङे - थोङे बांट कर खुश हैं रातों में 
बिना किसी फुल बिना किसी हुलगुल 
दिखता है माँ बेटे का प्यार पति का पुलकार 
बिना कोई दिन बिना किसी तालमेल के रंगीन 
चौक - चौराहे पर रेलों में देखो 
पीठ पर बाँधे बिना रिश्ते की बोझ 
बाँट रही है बस प्यार के दो बोल 
पर दुनिया को यकीन नहीं होता है उस पर 
क्योंकि रंगीन निशान हैं अब मोहब्बत के ऊपर.

तिनके का मोल (कविता) " हवेली से ऊंची है घास - पात की यह दुनियादारी एक - एक कर जोङा है तिनका - कठारी "

घोंसले को देखकर थाह ना लगा हमारी 
एक - एक कर जोङा है तिनका - कठारी, 
बिखरे सही उजङे ही सही 
पर लगन से बनाया हैं यही, 
है कमाई सुबह से सांझ की 
इसमें लागत नहीं है रात की, 
तभी तो टिकी हुई है ऊँचाई पर घास - पात 
कई महलों पेङो पर ये नन्हीं - सी बिसात, 
ना डर है किसी लुटेरे का 
ना ही किसी ठगैरे का, 
क्योंकि वह तो है बस रात का डेरा 
सुबह होते ही बनते हम जस ठठेरा,
घोंसले को देखकर थाह ना लगा हमारी 
हवेली से ऊंची है घास - पात की यह दुनियादारी 
एक - एक कर जोङा है तिनका - कठारी 
घोंसले को देखकर थाह ना लगा हमारी.

क्या है आजादी और कौन हैं राष्ट्रवादी ( कविता) "सिर्फ़ बोलना भर नहीं है मानवतावादी अब विचार कर लो स्वतंत्रता के बाद भी "

आजादी से पहले विचार करो
देशभक्त बनने की होङ नहीं थी
राष्ट्रवादी कहलाने की जोर नहीं थी,
अगर ऐसा होता तो सोचों
सब के सब देशभक्त बने बैठे होते
किसी कहीं कोने में बस रट लगाएँ
हम हैं राष्ट्रभक्त, हम हैं राष्ट्र के भक्त,
और आजाद ना होते अभी तक
तो फिर ना कोई अधिकार
ना ही कोई राष्ट्रीय त्योहार,
तो फिर सोचों क्या होता
ना बोलने की मिलती आजादी
बस होती राष्ट्रीय बर्बादी
राष्ट्रवाद के लिए पिटते छाती
राष्ट्र के नाम पर बनाते थाथी
क्योंकि सब तो नाम के लिए मरते
तो फिर गुलाम जंजीर से कैसे लङते,
पर जो लङे - लूटे दिए बलिदान
वो राष्ट्रभक्ति का नहीं लिए प्रमाण
क्योंकि उनको प्यारी थी आजादी
देश - प्रदेश और भारत के खेत का
मन में अग्न नहीं था द्वेष का
क्योंकि कोई धर्म नहीं था राष्ट्रप्रेम का
तब जाकर मिला है लोकतंत्र का अधिकार
और संवैधानिक पूर्ण यह संसार,
सिर्फ़ बोलना भर नहीं है मानवतावादी
अब विचार कर लो स्वतंत्रता के बाद भी
क्या है आजादी और कौन हैं राष्ट्रवादी.

मैं जननी हूँ(कविता) "पर आप इसको समझते क्यों नहीं मेरी भावना को पढते क्यों नहीं आखिर कब तक मैं बिकती रहूँगी"

मैं जननी हूँ

वो सुबह कितनी हसीन होगी 
वो शाम कितनी रंगीन होगी 
जब मैं आँगन में तेरे 
नन्हीं सी कली बन खिली होगी 
कोई रानी तो कोई रौशनी कहकर 
कोई बेटी तो कोई बाबु कहकर 
और जाने क्या - क्या कहकर 
सब प्यार से बुलाते होंगे, 
पापा, पर अब क्या हो गया 
आपका प्यार क्यों खो गया 
आप ना जाने क्यों गुमशुम है 
क्योंकि मैं अब बङी हो गई हूँ? 
इस महँगे बेदर्द शहर में 
कुण्ठित समाज के कहर से 
आप खुद को तन्हा ना समझो 
और हाँ, मुझको अबला ना समझो, 
क्या मैं शादी के लिए बनी हूँ 
क्या मैं सिर्फ एक कमी हूँ 
पापा अब आँखें खोल दो 
एकबार मुझे भी बेटा बोल दो, 
मैं तो रोज जलाई जा रही हूँ 
कभी-कभी खुद से जल जा रही हूँ 
पर आप इसको समझते क्यों नहीं 
मेरी भावना को पढते क्यों नहीं 
आखिर कब तक मैं बिकती रहूँगी? 
पापा अगर मैं चली जाऊँगी 
तो फिर कभी नहीं आऊंगी 
मैं ही पेङ और टहनी हूँ 
आप ना भूलों की मैं जननी हूँ. 

वो नारी है या नहीं (कविता) "पर जरा अपने उठते हाथ से पूछो बंद चारदीवारी की मार से पूछो "

जो लूट गई वो नारी है या नहीं
जो टूट गई वो नारी है या नहीं 
जो बुझ गई वो नारी है या नहीं 
जो डूब गईवो नारी है या नहीं 
जो घूंट गई वो नारी है या नहीं 
जो छुट गई वो नारी है या नहीं 
जो गिर गई वो नारी है या नहीं 
जो मिट गई वो नारी है या नहीं! 
हाँ! हाँ! मैं नारी हूँ 
और भी अाजमा लो पैंतरे 
मुझे शोषित करने का, 
उठा लो फायदा 
मेरे चूङी पहनने का 
घूंघट को ओढ़ने का, 
अब तो यकीन हो गया ना 
की मैं सिसकती दुबकी नारी हूँ, 
पर जरा अपने उठते हाथ से पूछो 
बंद चारदीवारी की मार से पूछो 
और फौजी - जवानों से पूछो 
की माँ - बेटी को मर्दानगी दिखाने वाले 
बिस्तर पर रौंदने वाले क्या है? 
वो नारी है या नहीं!