जवां - ज़ुबाँ के शब्द [कविता सँग्रह ]
Thursday, 29 January 2015
शीशे की मछली
शीशे की मछली
बड़ी खुश थी वो चारदीवारी पाकर
मचलती - छलकती ,कभी ऊपर - कभी नीचे
वो जल में नृत्य करती
क्यूँकि ना फिकर दाने की
ना ही डर मर जाने की
और वो खुश हो भी क्यों ना
बच जो गई थी इंसानो के बीच आकर
बड़ी खुश थी वो चारदीवारी पाकर।
Tuesday, 27 January 2015
इक परिन्दा उड़ चला
@शब्दों की श्रद्धांजलि,,,,आर के लक्ष्मण के नाम @
इक परिन्दा उड़ चला छोड़ कर अपना जहां
पर जर्रे - जर्रे पर अब तक निशां बाकी हैं
जब तक रहेंगे धरती - आसमां
फरिश्ता बन कर वो दिल में रहेगा
आग भले ही लग जाए चमन में
वो तो एहसास बनकर याद रहेगा
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