Thursday, 12 February 2015

सखी !बसंत कहाँ गया ? {कविता }

सखी !बसंत कहाँ गया ? {कविता }

लहराते पीले सरसों के फूल 
लाल पलाश जस खिले फूल 
कण - कण में मस्ती मशगूल 
हंसी - ठिठोली की रसूल 

वो कोयल की मीठी बोली 
वो गुलाल की मस्त होली 
वसुधा की दुल्हन - सी चोली 
सुबह- सा दूल्हा शाम की डोली ,

सखी !अब वो रवानी कहाँ गयी 
वो कोयल दीवानी कहाँ गयी 
वो सरसों सयानी कहाँ गयी 
बता दो प्रिये बसंत की जवानी कहाँ गयी ?

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