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फिरती अपनी दुनिया में
सुबह-शाम बस एक ही धुन
चूं चूं चूं और चूं चूं चूं
सुनकर जी करता चूमने को
एक मुट्ठी चुरा कर दाना
छिट देता खाने को
और फिर ढेरों आ जाती
नन्हे नन्हे पंख फैलाये
अपने हक का भोजन करने
खाती और फुदकती
चूं चूं चूं करती चूं चूं चूं करती
पर डर जाती पास जाने से
आखिर इतना बड़ा इंसान जो हूँ,
पर कभी-कभी पकड़ कर
रंग लगा उङा देता
रंगीन हूँ और रंगीन उसको बना देता
चलता था यह सिलसिला
सिलसिलेवार रोज रोज
और डर की चिड़िया उङ गई
क्योंकि अब दोस्त बन गए हम
एक घर में रहने लगे
और डर की चिड़िया उङ गई,
लेकिन अब बूढ़े समय पर
उसकी कमी खल रही हैं
कोई तो साथी था
जो बिना हार जीत के खेलता था
थोड़ा सा देने पर बहुत खुश होता था
पता नहीं कहां चल गई बिना बताये
शायद लगता है कि
गुलेल देख लिया हो
या फिर ठंड से
या फिर तपती गर्मी से
कहीं ऐसा तो नहीं है कि
बढते मोबाइल के कलह से
डर से चिड़िया उङ गई.
