सफेद - कुत्ते (कविता )
कभी हुए अमन - चमन के ,
तो कभी करवाएं मनुष्य के टुकड़े ,
फिर भी इनकी भूख न मिटी जाने कैसे है ये भूखङे ??
जात - भात समझ मे आती हैं , जानवरो की
पर इनकी परख वश में नही मानवरो की,
तो कभी करवाएं मनुष्य के टुकड़े ,
फिर भी इनकी भूख न मिटी जाने कैसे है ये भूखङे ??
जात - भात समझ मे आती हैं , जानवरो की
पर इनकी परख वश में नही मानवरो की,
कल देखा सुअर को मैंने खाते
बङे गुमान से उसको लजाते,
तो आई याद मेरे सफेद - कुत्ते की
वो खाते कम, क्यों
ज्यादा थाली है बजाते ?
बङे गुमान से उसको लजाते,
तो आई याद मेरे सफेद - कुत्ते की
वो खाते कम, क्यों
ज्यादा थाली है बजाते ?
खाओ - खाओ खूब खाओ परंतु धरम की आंच पर राजनीति की दाल ना पकाओ,
मानो "रनवीरा" की बात और सुअरों से सीख जाओ,
बस अब बहुत हुआ
खान - पान की राजनीतिक दुकान को गिराओ ।।
मानो "रनवीरा" की बात और सुअरों से सीख जाओ,
बस अब बहुत हुआ
खान - पान की राजनीतिक दुकान को गिराओ ।।
No comments:
Post a Comment