Thursday, 12 October 2017

एकता - अनेकता -अखण्डता

                   एकता - अनेकता -अखण्डता 

एकता - अनेकता -अखण्डता  के लिये 
आओ भारत वीर अब हम जीये 
बस एक रंग और एक मन के लिये 
आओ भारत वीर अब हम जीये ,


कर के याद लौह -वीर पुरुषाों  की कुर्बानी 
और करे याद लक्ष्मी -रानी की कहानी 


क्या भूल गए हो वो ग़ुलामी की जंजीरे 
राहें थी बाहे भी थी फिर भी भूले थे मंजिले 


तो आओ तोड़ चले जाति -धर्म  की दीवारें 
और बना दे निर्भय -निष्चल हिमालय -सी मीनारे 


गाँधी -पटेल -आजाद -सा स्वप्न लिए 
आओ भारत वीर अब हम जीए 

एकता - अनेकता -अखण्डता  के लिये
बस एक रंग और एक मन के लिये 
आओ भारत वीर अब हम जीये।

Sunday, 19 March 2017

चिड़िया उङ गई ( कविता)

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बेखौफ घूमती दाना चुंगती 
फिरती अपनी दुनिया में 
सुबह-शाम बस एक ही धुन 
चूं चूं चूं और चूं चूं चूं 
सुनकर जी करता चूमने को 
एक मुट्ठी चुरा कर दाना 
छिट देता खाने को 
और फिर ढेरों आ जाती 
नन्हे नन्हे पंख फैलाये 
अपने हक का भोजन करने 
खाती और फुदकती 
चूं चूं चूं करती चूं चूं चूं करती 
पर डर जाती पास जाने से 
आखिर इतना बड़ा इंसान जो हूँ, 
पर कभी-कभी पकड़ कर 
रंग लगा उङा देता 
रंगीन हूँ और रंगीन उसको बना देता 
चलता था यह सिलसिला 
सिलसिलेवार रोज रोज
और डर की चिड़िया उङ गई 
क्योंकि अब दोस्त बन गए हम
एक घर में रहने लगे 
और डर की चिड़िया उङ गई, 
लेकिन अब बूढ़े समय पर
उसकी कमी खल रही हैं 
कोई तो साथी था 
जो बिना हार जीत के खेलता था
थोड़ा सा देने पर बहुत खुश होता था 
पता नहीं कहां चल गई बिना बताये 
शायद लगता है कि 
गुलेल देख लिया हो 
या फिर ठंड से 
या फिर तपती गर्मी से 
कहीं ऐसा तो नहीं है कि 
बढते मोबाइल के कलह से 
डर से चिड़िया उङ गई. 

Saturday, 14 January 2017

पतंग और ज़िन्दगी

पतंग और ज़िन्दगी

पतंग के उत्सव में कट गई जिंदगी
डोर सांसों की, छूट गई हाथों से
चुल्लू भर पानी में डूबने की बात
हम कह ना सके
रखवालों से, किनारे वालों से
सरकार तो शोक जताएगी.

Thursday, 12 January 2017

एकता - अनेकता - अखण्डता

एकता - अनेकता - अखण्डता 

एकता - अनेकता - अखण्डता  के लिए 
आओं भारत वीर अब हम जीयें 
बस एक रंग और एक मन लिए 
आओं भारत वीर अब हम जीयें ,

कर के याद लौह - वीर - पुरुषों की कुर्बानी 
और करे याद लक्ष्मी - रानी की कहानी ,

क्या भूल गए हो वो गुलामी की ज़ंज़ीरे 
राहें थी , बाहें भी थी फिर भी भूले थे मंज़िले ,

तो आओ तोड़ चले जाति - धर्म की दीवारें 
और बना दे , निर्भय - निश्छल  हिमालय - मीनारें ,

गाँधी - भीम - पटेल सा स्वप्न लिए 
आओं भारत वीर अब हम जीयें
एकता - अनेकता - अखण्डता  के लिए
बस एक रंग और एक मन लिए
आओं भारत वीर अब हम जीयें ।।

Friday, 23 December 2016

सुंकी घाटी का टूटा दिल-

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सुंकी घाटी का टूटा दिल-

बिन आँखों के भी अश्क निकलते हैं
पत्थरों से पुछा तो जवाब आया
हम बिना दिल के भी धङकते है
बिन आँखों के भी अश्क निकलते हैं,
समझते हैं चलने वाले समझ कर
और करे भी क्या बुझ कर
चकाचौंध लाइट में
भागती भगाती जिन्दगी में
इंसान को इंसान की फिकर नहीं
तो फिर हम पत्थर को कौन समझेगा
पत्थरों से पुछा तो जवाब आया
कट जाते हैं हम
बन जाते हैं घाटी
बन के टुकड़े देते हैं राह बांटी
सुंकी के घाटियों की यह पुकार
उस रात दिखी घंटों बार - बार
हल्की बूंद की बारिश से
आंसुओं की अविरल लकीरें
दर्द बयां करती धीरे-धीरे
टूटे फूटे वह पत्थर
उजङे चिथङे मानव के तन जैसे
दिख रहे बस के प्रकाश में
और मन को कुरेदते हुये
जैसे किसी खास अपने का जख्म हो,
दिल से भरम मिट गया उस दिन
की पत्थरों के दिल नहीं होते
क्योंकि उन पत्थरों से जवाब आया
बिन आँखों के भी अश्क निकलते हैं
हम बिना दिल के भी धङकते है
बिन आँखों के भी अश्क निकलते हैं.

Sunday, 11 December 2016

फकीरा तू बड़ा 'फकीरा' ...(बोले कबीरा खान, लेकर के ज्यादा ज्ञान ,झोली भरकर चल पड़ा, देश - दुनिया की दुकान)

फकीरा बन गया
झोले का खोल दुकान
बोले कबीरा खान
लेकर के ज्यादा ज्ञान
झोली भरकर चल पड़ा
देश - दुनिया की दुकान
लेकर क्या करेगा
तू इतना धन -मान
फकीरा तू बड़ा फकीरा
कबीरा तो हैं नादान। 

Friday, 2 December 2016

तिरंगे के आड़ में (कविता )

तिरंगे के आड़ में 

तिरंगे के आगे सर उठाते हो 
और भ्र्ष्टाचार में गिर जाते हो ,

जन - गण का गान भी गाते  हो  
और मिथ्या लबों पे लाते हो ,

वीर - शहीदों पर श्रद्धा - सुमन लुटाते हो 
और दिल में कुस्वार्थ बसाते हो ,

लोकतंत्र में सेवा दिखाते हो 
और जनता से कर चुकवाते हो ,

पर एक तिरंगा और राष्ट्र एक हैं 
एक तन और मन भी एक हैं 
अब राष्ट्र के लिए तो  सच  बोलो 
तिरंगे के आगे सर उठाते हो 
या तिरंगे के आड़ में सर छुपाते हो ॥