Thursday, 28 April 2016

आज़ादी के मायने -- "आज़ादी हैं तो है बंदगी आज़ादी तो बस आज़ादी"

आजादी के परिंदों को 
फिक्र नहीं जीने का 
चलें गोली अंधाधुंध 
पर डर नहीं गिरने का
सीने में तुफान भरे 
कफन बांध जो चले
उसे जिंदगी न खले
क्योंकि आज़ादी में है जिंदगी
आज़ादी हैं तो है बंदगी 
आज़ादी तो बस आज़ादी
क्रांति मांगे आज़ादी
चाहे मिल कर मिले 
या फिर जल कर मिले

Tuesday, 26 April 2016

बढते हाथ

जब मौत सर पर हो
तो हथियार उठ जाते हैं 
और कसूरवार हथियार नहीं
हाथ होते हैं 
जो बढते ही जाते हैं.

Friday, 22 April 2016

जंगल से हैं जहान (कविता)

एक - एक कर गिर गए पत्ते पतझड़ में 
पर डाल कोई झुका नहीं 
बस सहता रहा मार समय की 
पर जङ से अपने हिला नहीं 
चली आँधियां, आई तूफान 
और साथ ना दी जमीनी जान 
मिट्टीयों के चिथङे - चिथङे थे, उखड़े जहां 
पर तन से जङ कटा नहीं 
डाल से पत्ता हटा नहीं 
भले ही मर गया वह पेङ पुराना 
पर दे चला नया जंगल जहान 
पेङ है पर पैरों वालों से महान 
जंगल से हैं ये जहान 
ए! पेङ तुझे नतमस्तक प्रणाम