Sunday, 22 May 2016

मन उठता लहरों की तरह

ठंडी हवा और मौसम का घर
बस गया मन उसमें घुस कर
किनारें पर ही सही
पर रेत मखमली
PC- Gyanchand Jagnnath
लगा बिलकुल दर्द से दूर
जब हवाओं ने छुआ
मन खो गया अज़नबी जहां में
लेकिन लगा रिश्ता सदियों पुराना
उठती लहरें तोड़ती खामोशियाँ
लिये शोर मन को झकझोरे
मन भी उठता लहरों की तरह
उस पार जाने के लिये
मदमस्त हवा चुराने के लिए
पर क्या करूँ
इस बेचारे जिस्म को डूबने का डर था.