बापू का निर्मल गाँव
गाँधी उस गाँव का नाम
जहाँ बसता था तन लुभाता सूरज
जहाँ रहती थी मन चुराती शाम ,
जहाँ बहती थी बस ताज़ी हवाएँ
और रहते थे लोग सद्कर्मों में में मन बसाये ,
जहाँ धरती थी चुनर में सजती
जहाँ गंगा में पावनता थी झलकती ,
जहाँ बदन -सी कोमल थी माटी
जहाँ चिड़ियाँ की थी राग बजाती ,
और थी जन्नत- सी हर काम
गाँधी हैं उस नव - सदसोंच का नाम,
गाँधी हैं उस नव - सदसोंच का नाम,
अब हमे भी वहीं करना हैं
इस विनाशी काल से लड़ना हैं
पेड़ो से धरा को भरना हैं
कचरों को अब दूर करना हैं
अकेले नहीं सबको साथ ले चलना है
एक नये पर्यावरण का राह गढ़ना हैं
बस वीरों के राह में हमको ढलना हैं
और गर्व से बस यही कहना हैं
ये हैं गाँधी सोंच का परिणाम
यह हैं मेरे "बापू का निर्मल गाँव " । ।
ये हैं गाँधी सोंच का परिणाम
यह हैं मेरे "बापू का निर्मल गाँव " । ।