Wednesday, 30 September 2015

गुहार क्यूँ ?

 गुहार क्यूँ ?

प्यार के दुश्मनों से गुहार क्यूँ 
अनसुनो के दर पर पुकार क्यूँ ?

शान्ति - समझौते वो बस एक नाटक 
समझता हैं बस खुद को वो घातक 

करता हैं खिलवाड़ हर वक़्त मानवता से 
और देता हैं सुविचार वो दानवता पे 

वीणा की वाणी की उसको न परख हैं 
बिन मंज़िल की पगडण्डी वो सड़क हैं 

उसको तो भाषा बस हिंसा की आती 
मानव वेश में वो हैं दानव जाति 

भरत - राम का रिश्ता ना जाने 
गाँधी - ज़िन्ना के वो वो बोल ना माने 

इंसान को इन्सानियत जो हैं बचानी 
स्वर्ग - सी धरा अगर हैं सजानी 

तो प्यार के दुश्मनों से गुहार क्यूँ 
अनसुनो के दर पर पुकार क्यूँ ?

समझ जा रे! सौदागर इंसान (कविता )

समझ जा रे! सौदागर इंसान 

कहीं नीला, कहीं काला तो कभी कहरीला
मुहँ फाङे मातम ले आए
जो था कभी सावन का साज सुरीला
मर रहा कोई  सूखा - सूखा
टूट रहा कोई  झूका - झूका
जल रहा है कोई तपन से
तो कोई बिना अग्न के,
अब आङ में किसके जाए जहान
विनाश कर के समझे सब खुद को महान
दे रहे चेता धरा - तरू और आसमान
समझ जा रे ! सौदागर इंसान ।।

Saturday, 26 September 2015

एक गुड़िया बड़ी प्यारी[कविता ]

एक गुड़िया बड़ी प्यारी[कविता ]

एक गुड़िया बड़ी प्यारी - बड़ी न्यारी
सब उसकी करते प्यार से खातिरदारी
बड़ी होकर चल पड़ी बन के नेत - नारी
पर पता नहीं था होती हैं क्या दुनियादारी ?

चल पड़ी बेख़ौफ़ अपने चमन में
दो - चार पग चलकर खुश थी अमन में
बैठ गई बेफिकर अपने पीपल के छाँव में
अचानक गड गए शूल उसके पाँव में ,

लहुलहान  हो जब खोली वह अपनी पलकें
झपकती  नज़रों से देखी ऐसी झलके
वह पीपल का पेड़ अपना था
जिसने उसको खुद में जकड़ा था
लूटेरा भौंरा था वहीं , जो उसका सपना था ,

बस हो - हल्ला में छिप गई वो बेचारी
छोड़ चली झूठी चमन की भरी क्यारी
और लोग आहें भर कहते रहे
एक गुड़िया थी बड़ी प्यारी - बड़ी न्यारी ।।


ना माली की , ना डाली की [कविता ]

बन कर के हम फूल महकते - महकाते
अपनी खूबसूरती से दमकते - दमकाते 
जहाँ भी हम जाते बेरंगों  में रंग भर आते 
तारों - सा धरा को हम हैं सजाते ,

शादी या शोक सभा सबको हमने खुद से सजाया 
खिल के या गिर के बस खुशबु फैलाया 
हर गीत - सा लोगों ने मन में बसाया 
मैं तो खिलती रही ,चाहे धूप हो या छाया ,

पर मैं तो ना रही माली की ना डाली की 
और ना ही रही शोभा ,श्रद्धा के थाली की 
नारी - सा ही मुझको भी ,कभी घूँघट में कभी पैरों तले दबाया 
आज भी वैसी ही हूँ , चाहे राम मिले या दुश्शाया ।। 

Tuesday, 22 September 2015

तो किस शरण में हो फरियाद?{कविता }


मंदिर जाऊँ या मस्जिद 
या करूँ ना तुझको याद ,
तेरे घर ही अब जल रहे है 
तो किस शरण में हो फरियाद?

टुकङे - टुकङे हो गए है 
तेरे ओढाए तन के लिबास, 
खुद ही खङे हो उधङ बदन 
तो कौन बचाए हमारी लाज?

हो रहा व्यापार तेरा 
ढोंगी बेचे बैठ के बिंदास, 
तेरी किमत तो यूं लग गई 
तो न्याय की किससे रखे हम आस?


धमाको से तो जगा नही 
कुकर्मी को भी सजा नही 
तू भी अंधा हो गया है रे "रनवीरा " 
पत्थर से मांगने चला है साँस ।।

Monday, 21 September 2015

और लोग कहते हैं की .....

इस देश में नदीयों में नदीयाँ रहती है
फिर भी फसल प्यासे  मरती है
नाली - नाले भरे मिलते है कचरों उससे
और लोग कहते है यही तो गंगा बहती है,

नारी पर अत्याचार करे
फिर भी नारी को जननी कहे
अरेसरेआम यहाँ होलिका जलती है
और लोग कहते है यही दुर्गा की धरती है,

रामायण - कुरान यहाँ पर है पूजे जाते
और
 धर्म के नाम पर खूब माल कमाते
अरे ! यहाँ धर्म के नाम पर लाशे ढहती है
और लोग कहते है कि यह बुध्द की बस्ती है,

बकरो की बली चढाते
गायों की हत्या करवाते
अरेयहाँ फरिश्ते भी स्वाद चखती है
और लोग कहते है कि यह शेरों की शक्ति है ।।

Monday, 14 September 2015

हिंदी हिंसा का किस्सा [कविता ]


कबीर - भारतेंदु - प्रेमचंद की करते हैं पूजा
और पालक झपकते बनाते हैं हिंदी को दूजा ,

बस गिने - चुने लोगों में ही अब इसका नाम हैं
हिंदी हैं हिंदुस्तानी बस यह एक नाम हैं ,

हिंदी हमारी हैं प्यारी , और हैं माथे की बिंदी
पर हिंदी - दिवस में ही केवल बनती हैं लबों की गिनती ,

अपने ही घर में भई ! पढने को हिंदी करे गुहार
अब तो बस पन्नों में ही बस हैं सभ्य - संस्कार ,

पर अब भी भारत - वीरों में , बसी हैं हिंदी की स्याही
जब तक ना मिलेगी हिंदी को हंसी , यूँ ही चलेगी ये लड़ाई ,

कलम - शब्द फिर मिलेंगे , बनेगी फिर हिंदी हर तन का हिस्सा
साँसे - स्याही से लड़ेंगे , चाहे कितना भी बने हिंदी - हिंसा का किस्सा । । 

Saturday, 5 September 2015

गुरु गुण की गाथा ---------------- तुम ही तो हो ब्रह्माण्ड के रचनाकार हो तुम ही आदर्श जीवन के सदविचार हैं गुरु करम को , शत - शत नमन नमस्कार ।।


गुरु तुम सारे गुण में हो
अन्नत से लेकर , शून्य में हो
तुम ही तो हो एक सच्चा धर्म
और हर पुण्य के कर्म में हो
गुरु तुम सारे गुण में हो ,

काले स्लेट पर ऊजला ज्ञान
कोरे मन में प्रज्वलित ध्यान
लटपटाती लबों को अचूक कमान
बिखरे शब्दों को अर्थकारी पहचान
ना होते तुम तो रवि रहता अंधयान
और रहती वसुधा बस बंजरबान ,

तुम हो तो यह " रणवीरा " हैं
और बनी हैं कविता सुरवान
तुम हो महान से भी महान
तुम ही तो हो ब्रह्माण्ड के रचनाकार
हो तुम ही आदर्श जीवन के सदविचार
हैं गुरु करम को , शत - शत नमन नमस्कार ।।