कभी आ करीब मेरे भी
यूं दूर - दूर क्यों हैं?
तू तो आवाज सुनता नहीं
कब से चिल्ला रहा हूँ बुला रहा हूँ
कितने अमावस्या - पूणि़ॅमा बीत गए
और तू मेरी रोटी की तरह
कभी थोङा कभी आधा कभी पूरा
बस घटता और बढता रहा
मेरी रोटी कट - कट कर विलय हो गई
पर तू घट - घट कर भी बढते रहा
तू बङा कमाल का रोटी हैं
काश कि तू पास होता
हाँ! मेरी कटोरी में
जो कि बिल्कुल तेरे आकार का है
तो फिर रोटी खत्म होने की फिक्र नहीं होती
भूख की हमारी सिर्फ जिक्र नहीं होती
चलो ठीक है तुम धरती से दूर ही रहो
क्या भरोसा हमसे कोई छिन ले जाएं
या हम ही पचा जाए, भूख्खङ जो ठहरे
पर क्या करें!
क्योंकि हम प्रकृतिक लाचार है
छिनने वाले कागजी बीमार है
और यहां उनकी भरमार है
चलो ठीक है हम जैसे भी जी लेंगे
नाली का जल पी लेंगे
बस तू यूं ही बिन बील बिजली देते रहना
तू हमारी तरह स्वार्थी मत बनना
पर मन ही मन में डर लगता है तुम पर
क्योंकि लोग अब रहने वाले हैं तेरे भी ऊपर.
यूं दूर - दूर क्यों हैं?
तू तो आवाज सुनता नहीं
कब से चिल्ला रहा हूँ बुला रहा हूँ
कितने अमावस्या - पूणि़ॅमा बीत गए
और तू मेरी रोटी की तरह
कभी थोङा कभी आधा कभी पूरा
बस घटता और बढता रहा
मेरी रोटी कट - कट कर विलय हो गई
पर तू घट - घट कर भी बढते रहा
तू बङा कमाल का रोटी हैं
काश कि तू पास होता
हाँ! मेरी कटोरी में
जो कि बिल्कुल तेरे आकार का है
तो फिर रोटी खत्म होने की फिक्र नहीं होती
भूख की हमारी सिर्फ जिक्र नहीं होती
चलो ठीक है तुम धरती से दूर ही रहो
क्या भरोसा हमसे कोई छिन ले जाएं
या हम ही पचा जाए, भूख्खङ जो ठहरे
पर क्या करें!
क्योंकि हम प्रकृतिक लाचार है
छिनने वाले कागजी बीमार है
और यहां उनकी भरमार है
चलो ठीक है हम जैसे भी जी लेंगे
नाली का जल पी लेंगे
बस तू यूं ही बिन बील बिजली देते रहना
तू हमारी तरह स्वार्थी मत बनना
पर मन ही मन में डर लगता है तुम पर
क्योंकि लोग अब रहने वाले हैं तेरे भी ऊपर.