Saturday, 26 September 2015

एक गुड़िया बड़ी प्यारी[कविता ]

एक गुड़िया बड़ी प्यारी[कविता ]

एक गुड़िया बड़ी प्यारी - बड़ी न्यारी
सब उसकी करते प्यार से खातिरदारी
बड़ी होकर चल पड़ी बन के नेत - नारी
पर पता नहीं था होती हैं क्या दुनियादारी ?

चल पड़ी बेख़ौफ़ अपने चमन में
दो - चार पग चलकर खुश थी अमन में
बैठ गई बेफिकर अपने पीपल के छाँव में
अचानक गड गए शूल उसके पाँव में ,

लहुलहान  हो जब खोली वह अपनी पलकें
झपकती  नज़रों से देखी ऐसी झलके
वह पीपल का पेड़ अपना था
जिसने उसको खुद में जकड़ा था
लूटेरा भौंरा था वहीं , जो उसका सपना था ,

बस हो - हल्ला में छिप गई वो बेचारी
छोड़ चली झूठी चमन की भरी क्यारी
और लोग आहें भर कहते रहे
एक गुड़िया थी बड़ी प्यारी - बड़ी न्यारी ।।


ना माली की , ना डाली की [कविता ]

बन कर के हम फूल महकते - महकाते
अपनी खूबसूरती से दमकते - दमकाते 
जहाँ भी हम जाते बेरंगों  में रंग भर आते 
तारों - सा धरा को हम हैं सजाते ,

शादी या शोक सभा सबको हमने खुद से सजाया 
खिल के या गिर के बस खुशबु फैलाया 
हर गीत - सा लोगों ने मन में बसाया 
मैं तो खिलती रही ,चाहे धूप हो या छाया ,

पर मैं तो ना रही माली की ना डाली की 
और ना ही रही शोभा ,श्रद्धा के थाली की 
नारी - सा ही मुझको भी ,कभी घूँघट में कभी पैरों तले दबाया 
आज भी वैसी ही हूँ , चाहे राम मिले या दुश्शाया ।।