एक गुड़िया बड़ी प्यारी[कविता ]
एक गुड़िया बड़ी प्यारी - बड़ी न्यारीसब उसकी करते प्यार से खातिरदारी
बड़ी होकर चल पड़ी बन के नेत - नारी
पर पता नहीं था होती हैं क्या दुनियादारी ?
चल पड़ी बेख़ौफ़ अपने चमन में
दो - चार पग चलकर खुश थी अमन में
बैठ गई बेफिकर अपने पीपल के छाँव में
अचानक गड गए शूल उसके पाँव में ,
लहुलहान हो जब खोली वह अपनी पलकें
झपकती नज़रों से देखी ऐसी झलके
वह पीपल का पेड़ अपना था
जिसने उसको खुद में जकड़ा था
लूटेरा भौंरा था वहीं , जो उसका सपना था ,
बस हो - हल्ला में छिप गई वो बेचारी
छोड़ चली झूठी चमन की भरी क्यारी
और लोग आहें भर कहते रहे
एक गुड़िया थी बड़ी प्यारी - बड़ी न्यारी ।।