हिन्दी -हिंसा {कविता }
कबीर -भारतेन्दु -प्रेम की करते है हम पूजा
और पलक झपकते ही बनाते है हिंदी को दूजा ,
बस गिने चूने लोगो में ही अब इसका काम है
हिंदी है हिंदुस्तानी बस ये एक नाम है ,
हिंदी हमारी हैं प्यारी ,और है माथे की बिंदी
केवल हिंदी दिवस में ही बनती लबो की गिनती ,
अपने ही घर में भई ,पढने को हिंदी करे गुहार
अब तो बस पन्नों में ही हैं हमारे सभ्य -संस्कार ,
पर अब भी भारत वीरों में बसी है हिंदी की स्याही
जब तक न मिलेगी हिंदी-हँसी यूँ ही चलेगी ये लड़ाई ,
कलम -शब्द फिर मिलेंगे बनेगी हिंदी हर तन की हिस्सा
साँसे -स्याही से लड़ेंगे चाहें जितना भी बने "हिंदी -हिंसा "किस्सा।
-रवि कुमार गुप्ता
ऍम.ए.. इन जर्नलिज्म एण्ड मास कम्युनिकेशन
केंद्रीय विश्व्विद्यालय ,ओड़िसा