Thursday, 12 February 2015

सखी !बसंत कहाँ गया ? {कविता }

सखी !बसंत कहाँ गया ? {कविता }

लहराते पीले सरसों के फूल 
लाल पलाश जस खिले फूल 
कण - कण में मस्ती मशगूल 
हंसी - ठिठोली की रसूल 

वो कोयल की मीठी बोली 
वो गुलाल की मस्त होली 
वसुधा की दुल्हन - सी चोली 
सुबह- सा दूल्हा शाम की डोली ,

सखी !अब वो रवानी कहाँ गयी 
वो कोयल दीवानी कहाँ गयी 
वो सरसों सयानी कहाँ गयी 
बता दो प्रिये बसंत की जवानी कहाँ गयी ?

Wednesday, 11 February 2015

जीतना जरूरी था {कविता }


जीतना जरूरी था 

आपका जीतना जरुरी था
उनका हारना जरूरी था
भगोड़े तो टीक गए
कहने वालो का भागना जरूरी था ,

बड़ी हो चुकी थी गन्दगी
काम ना आइ झूठी बन्दगी
दिखावे का फूल हटाना जरूरी था
नए जोश से झाड़ू लगाना जरुरी था ,

लहरों को हो गया था गुमान
यूँ ही भर रही थी तूफ़ान
पर किनारे तक लाना जरूरी था
ऐसे टूटती हैं लहर बताना जरूरी था।  

Sunday, 1 February 2015

नामी - गिरामी {कविता }

नामी - गिरामी {कविता }

केजीरवाल अगर भगोड़ा हैं 
तो किरण भी उसी कढ़ाई की पकोड़ा हैं ,
सोनिया बस नाम की गाँधी हैं  
अन्ना के नाम पर "आप" की चाँदी हैं ,
भाजपा के मोदी हैं 
या बीजेपी मोदी की गोदी हैं !

                      -रवि कुमार गुप्ता 
                      गोपालगंज , बिहार 

टूटता - लोकतंत्र {कविता}

          टूटता - लोकतंत्र 

वादों की ले झूठी तलवार
गरीबो को ना भरमाओ सरकार
पहन के तुम सफ़ेद चोला
लोकतंत्र पर ना करो प्रहार

गली - गली ना बदलो भाषा
ना तुम तोड़ो समाजवाद की आशा
संविधान को ना बनाओ बाजार
लोकतंत्र पर ना करो प्रहार.