बन कर के हम फूल महकते - महकाते
अपनी खूबसूरती से दमकते - दमकाते
जहाँ भी हम जाते बेरंगों में रंग भर आते
तारों - सा धरा को हम हैं सजाते ,
शादी या शोक सभा सबको हमने खुद से सजाया
खिल के या गिर के बस खुशबु फैलाया
हर गीत - सा लोगों ने मन में बसाया
मैं तो खिलती रही ,चाहे धूप हो या छाया ,
पर मैं तो ना रही माली की ना डाली की
और ना ही रही शोभा ,श्रद्धा के थाली की
नारी - सा ही मुझको भी ,कभी घूँघट में कभी पैरों तले दबाया
आज भी वैसी ही हूँ , चाहे राम मिले या दुश्शाया ।।
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