Saturday, 26 September 2015

ना माली की , ना डाली की [कविता ]

बन कर के हम फूल महकते - महकाते
अपनी खूबसूरती से दमकते - दमकाते 
जहाँ भी हम जाते बेरंगों  में रंग भर आते 
तारों - सा धरा को हम हैं सजाते ,

शादी या शोक सभा सबको हमने खुद से सजाया 
खिल के या गिर के बस खुशबु फैलाया 
हर गीत - सा लोगों ने मन में बसाया 
मैं तो खिलती रही ,चाहे धूप हो या छाया ,

पर मैं तो ना रही माली की ना डाली की 
और ना ही रही शोभा ,श्रद्धा के थाली की 
नारी - सा ही मुझको भी ,कभी घूँघट में कभी पैरों तले दबाया 
आज भी वैसी ही हूँ , चाहे राम मिले या दुश्शाया ।। 

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