बस यहाँ इंसान रहते हैं (कविता )
ओ ! मगरूर इंसानो
अरे धर्म के परवानो
इंसान को ना मारो ,
मजहब से करते हो बैर
तो जिहाद का लगाओ खैर
अब मासूम लोगो को करो ना ढेर ,
दिखावे के लिए कब तक चलेगा खूनी - खेल
रथ हो या तजिया का धर्म रेल
मन्नत हो या हो प्रार्थना सबका है एक मेल
क्योंकि मंदिर हो या मस्जिद
कहीं अल्लाह या भगवान नही बसते है
हम ही बनाते है सारे कोठे - अटारी
और हर जगह पर यहाँ इंसान रहते है ।।