सब बिकता हैं
कभी गुल तो कभी गुलज़ार दिखता हैं
यहीं पर सारा संसार दिखता हैं ,
यहीं पर सारा संसार दिखता हैं ,
मानवता की कोई कीमत ही नहीं
दानवता यहाँ बेशुमार बिकता हैं ,
दफ़न अब करने को कोई नहीं
यहाँ तो लाश दमदार बिकता हैं ,
हैं कोई मानव तो मुझको बता दे
क्यूँ यहाँ सच सौ बार लूटता हैं ?
क्यूँ तुम कहते हो खामोश रहने को
बस यहाँ बड़े बोल का बाज़ार टिकता हैं ,
सुना था झूठों किम लगती हैं कीमत
यहाँ तो न्याय का दरबार बिकता हैं ,
अखबार का बिकना तो सही हैं
पर यहाँ तो हिसाब लगा के समाचार बिकता हैं। ।
-रवि कुमार गुप्ता "रणवीरा "
ऍम.ए.. इन जर्नलिज्म एण्ड मास कम्युनिकेशन
केंद्रीय विश्व्विद्यालय ,ओड़िसा