मांगी है रिहाई मैंने अपने खुदा से
जिंदगी के बढ़ते पिङा से
जख्म बन गए हैं ऊंचे ख्वाब
दर्द में कैद हैं जिंदा अल्फाज़
जिसने दी ऊंचाई वह नीचे रह गया
और आंख ऊपर से ताकता रह गया
हाथ भी हाथ को छू नहीं पाते
चलते चलते यह जख्म किसे दिखाते
वक्त हैं जो कि चलता रहता है
इंसान भी बस संग में ढलता रहता है
जिंदगी यह जिंदगी
जिंदा हो कर भी जलती हैं
मुर्दा बन कर भी जलती हैं.
जिंदगी के बढ़ते पिङा से
जख्म बन गए हैं ऊंचे ख्वाब
दर्द में कैद हैं जिंदा अल्फाज़
जिसने दी ऊंचाई वह नीचे रह गया
और आंख ऊपर से ताकता रह गया
हाथ भी हाथ को छू नहीं पाते
चलते चलते यह जख्म किसे दिखाते
वक्त हैं जो कि चलता रहता है
इंसान भी बस संग में ढलता रहता है
जिंदगी यह जिंदगी
जिंदा हो कर भी जलती हैं
मुर्दा बन कर भी जलती हैं.
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