ठंडी हवा और मौसम का घर
बस गया मन उसमें घुस कर
किनारें पर ही सही
पर रेत मखमली
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| PC- Gyanchand Jagnnath |
लगा बिलकुल दर्द से दूर
जब हवाओं ने छुआ
मन खो गया अज़नबी जहां में
लेकिन लगा रिश्ता सदियों पुराना
उठती लहरें तोड़ती खामोशियाँ
लिये शोर मन को झकझोरे
मन भी उठता लहरों की तरह
उस पार जाने के लिये
मदमस्त हवा चुराने के लिए
पर क्या करूँ
इस बेचारे जिस्म को डूबने का डर था.

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