आज भी डुबाऊंगा
भारत में मुद्दे जाने कितने गड़े हैं
उनमें फायदा नहीं इसलिये वो सड़े हैं ,
पर एक मुद्दा हैं मेरे पास ,
समस्या हैं मौसमी पर है बड़ा ही खास,
और उससे जुड़ी हैं गरीबों की आस ,
एक दिन शहर से जब गया में गाँव
सड़क थी चमकती पर नहीं थी कोई छाँव
कुछ दूर चलकर रूक गए गाड़ी के पाँव
चिल्लाया चालक चलो पकड़ लो ये आखिरी नाव ,
भूसे की भाँति सब चढ़ के चले रे संग
पर सब के उड़े थे चेहरे के रंग
जनम से अभी तक लड़ रहे हैं बाढ़ की जंग
पर देख यह तमाशा मैं तो रह गया दंग ,
बच्चे नंगे -भूखे खाली कटोरी ले चिल्ला रहे थे
जाने ना जाने कैसे सब खुद को जीला रहे थे
हंसो की टोली जस नेताजी लोग आ रहे थे
और मुस्कुरा के हाथ मिला रहे थे ,
मेरे समझ से परे थी ये सफ़ेद भाषा
इतने हैं नेता फिर भी ऐसी हैं हमारी दाशा
पर इन गरीबो को अब भी हैं आशा
कभी न कभी तो पलटेगा भई हमारा पासा ,
मैं तो पत्रकार हूँ बस खबर ही बनाऊंगा
मैं हूँ नेता बस आवाज़ ही उठाऊँगा
हम तो गरीब हैं गुहार ही लगाउँगा
मैं तो बाढ़ हूँ ,इस गांव को कल भी डुबाया था
और आज भी डुबाऊंगा।
रवि कुमार गुप्ता
this is the work of true journalist to dig out the truth underground of various lies..........
ReplyDeleteVery well executed Ravi.... its the real truth of our country..
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